Gordhan Zadaphia, a powerful Gujarat leader who was once a critic of Prime Minister Narendra Modi, made a stunning comeback to national politics today with the ruling BJP giving him charge of the party in Uttar Pradesh. Mr Zadaphia, who quit the party and contested against it before his return in 2014, is among the 17 new state in-charges appointed by BJP president Amit Shah to prepare for the national election due by May.
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Wednesday, December 26, 2018
"You'll Build Mosque?" The Video That Likely Triggered Noida Namaz Diktat
Days after the Noida police told multinational companies in Sector- 58 to direct their employees not to offer Friday prayers in a community park, a video showing a group of right-wing activists bullying a few Muslims in the park has emerged as the likely cause of the much-criticised diktat.
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Row Over Namaz In Park: Is Majoritarianism The New Normal?
What gives the police the right to tell companies in Noida to tell their Muslim workers not to pray in a public park? Sure, there may be legal sanction - guidelines issued by the Supreme Court which banned the unauthorised use of public places for religious activities - but is that what this is really about? Let's look at it logically - a video emerges, apparently shot by a member of a fringe group, asking, rebuking in fact, Muslim citizens in a park. This video was reportedly handed over to the police and then companies were told "look, you had better warn your employees or else..." Now, the District Administration has said that the letter of the police will not apply, but the larger question remains: Why have this bizarre no namaz in a park diktat in the first place? Is majoritarianism the new normal?
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मेघालयः खान में फंसे मजदूरों का दो हफ्ते बाद भी पता नहीं
दो हफ़्ते गुज़र गए, मेघालय के ईस्ट जैंतिया हिल्स के एक दूर दराज़ इलाके की एक अवैध खान में फंसे 15 मज़दूरों के बारे में अभी तक कोई ख़बर नहीं है... वो ज़िंदा हैं या नहीं, इसका कोई सुराग़ नहीं लग रहा...
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भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच कहां तक पहुंची?
इस साल पहली जनवरी को महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हिंसा हुई थी. उसके ठीक एक दिन पहले यानी 31 दिसंबर 2017 को वहीं पर यलगार परिषद की सभा हुई थी. 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव में हिंसा होती है, 1 व्यक्ति की मौत होती है और कई लोग घायल होते हैं. इसके अलावा 10 करोड़ के बराबर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचता है. इस मामले को लेकर पुणे पुलिस जांच आरंभ करती है और 6 जून को पांच लोगों को गिरफ्तार करती है. इनके नाम हैं, सुधीर धवले, रौना विल्सन, सुरेंद गडलिंग, शोमा सेन और महेश रावत। इन पर हिंसा भड़काने और माओवादियों से रिश्ता रखने का आरोप लगता है। प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश रचने के आरोप भी लगते हैं. इन पांचों के मामले में पुणे पुलिस ने 15 नवंबर को चार्जशीट दायर कर दी है। हमारी सहयोगी श्रुति मेनन ने कई दिन लगाकर 5600 पन्नों की चार्जशीट का अध्ययन किया है. यह देखने के लिए कि मीडिया में जिन आरोपों की चर्चा हुई है, उससे संबंधित पुलिस ने क्या क्या तथ्य जुटाए हैं। श्रुति मेनन ने अपने अध्ययन में क्या पाया है, उसके पहले एक और घटना के बारे में याद करना ज़रूरी है.
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सिटी सेंटर: बड़े हमले की साजिश का पर्दाफाश, दिल्ली के हर घर में अब स्मार्ट बिजली मीटर
एनआईए ने भारत में इस्लामिक स्टेट के एक बड़े मोड्यूल हरकत उल हर्ब ए इस्लाम का भंडाफोड़ करने का दावा किया है. उसने दिल्ली और यूपी से 10 लोगों को गिरफ्तार भी किया है. एनआइए के मुताबिक ये लोग दिल्ली में 26 जनवरी के पहले बड़े पैमाने पर हमले की तैयारी कर रहे थे. उधर, दिल्ली के हर घर में अब लगेगा स्मार्ट मीटर. जो बताएगा कि आपके घर में कौन सा उपकरण कितनी बिजली की खपत कर रहा है और दफ्तर में बैठे बैठे घर में चल रहे बिजली के उपकरण बंद कर सकते हैं.
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प्राइम टाइम: सरकारी बैंकों की हालत क्यों ख़राब है?
2018 का साल आया नहीं था, कि न्यूज़ चैनलों पर 2019 को लेकर चर्चा शुरू हो गई. सर्वे दिखाए जाने लगे. काश ऐसा कोई डाटा होता कि एक साल में 2019 को लेकर कितने सर्वे आए और चैनलों पर कितने कार्यक्रम चले तो आप न्यूज़ चैनलों के कंटेंट को बहुत कुछ समझ सकते थे. एक दर्शक के रूप में देख सकते थे कि आपने 2018 में 2019 को लेकर अनगिनत कार्यक्रमों से क्या पाया. इसे न मैं बदल सकता हूं और न आप क्योंकि 2019 में आप 2019 को लेकर इतने कार्यक्रम देखने वाले हैं कि लगेगा कि काश 2020 पहले आ जाता. इन सर्वे में होता यह है कि सब कुछ डेटा बन जाता है. यूपी में कितनी सीट, बिहार में कितनी सीट. जनता के अलग-अलग मुद्दे नहीं होते हैं. पिछले एक साल के दौरान हमने पचासों प्रदर्शन कवर किए हैं, तो क्यों न हम देश भर में होने वाले प्रदर्शनों के ज़रिए 2019 के नतीजों को समझा जाए. नतीजे न सही कम से कम यही दिखे कि मौजूदा सरकार अलग-अलग तबकों के बीच किस तरह के सवाल छोड़ कर जा रही है. क्या इन सवालों का चुनाव पर क्या असर पड़ेगा. देखिए आज का प्राइम टाइम.
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